बिलासपुर – कतियापारा मोपका चौक स्थित स्व. श्री लल्लू हलवाई के वार्षिक श्राद्ध में चल रहें श्री मदभागवत ज्ञानयज्ञ कथा में भगवान श्री कृष्ण संग माता रूखमणी का विवाह बाजे गाजे के साथ बारात निकाल पूर्ण विधि से संपन्न कराया गया तत्पश्चात सुदामा संग भगवान मिलाप का कथा सुनाया गया ब्रज की होली में फूलों से होली खेली गई।

श्री मदभागवत कथा में जिस प्रकार कोई अपनी बेटी का विवाह करता है ठीक उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण संग माता रूखमणी का विवाह कराया गया विवाह की सभी रस्में पूरी की जहां भक्त भी भगवान के विवाह के साक्षी बने आज भगवान की सादी है गाने में महिलाएं झूम उठी कथावाचक पं देवेंद्र पाण्डेय ने तेल हल्दी करते समय भावर, भडवनी ,स्वागत विदाई गीत गाकर पंडाल में उपस्थित श्रोताओं के मन मोह लिया उन्होंने सुदामा और कृष्ण मित्र मिलाप प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सुदामा-कृष्ण की कथा से हमें मित्रता करने की सीख मिलती है। उन्होंने कहा कि सुदामा जैसा मित्र कलयुगी संसार में नहीं मिल सकता मित्रता में गरीबी अमीरी नहीं देखी जाती श्रीकृष्ण भले ही राजा थे लेकिन जब उन्हें पता चला कि उनके मित्र सुदामा आए हैं

तो वे मित्र से मिलने नंगे पैर महल से बाहर दौड़ पड़े मित्र को देखते ही गले लगाकर आदर भाव से महल के अंदर लेकर पहुंचे जहां खूब स्वागत सत्कार किया जबकि मित्र सुदामा हो अपनी दरिद्रता के कारण अपने मित्र से मिलने में संकोच हो रहा था लेकिन वे अपनी पत्नी की हठ पर भगवान से मिलने गए थे उन्होंने सुदामा की पोटली में बंधे चावल खाकर उन्हें राजपाट दिया आज यदि किसी के मित्र पर आपत्ति आती है तो उसके मित्र साथ छोड़ देते हैं आज इस युग मे भाई भाई का साथ नही देता गरीबी होने पर ही अच्छे मित्र की पहचान होती है कथा में अरे द्वार पालो कन्हैया से कहे दो के दर पे सुदामा गरीब आ गया है गीत सुनकर पंडाल में उपस्थित श्रोताओं की आंखों में पानी छलक आया सुदामा चरित्र की कथा के बाद ब्रज की होली में फूलों की होली खेली गई इसके बाद भगवान कृष्ण की मंगलमय आरती के बाद कथा को विश्राम दिया गया।

आगे परीक्षित मोक्ष के कथा के दौरान कहे की मोक्ष की कामना प्रत्येक मनुष्य करता है,लेकिन सभी को सही राह नहीं मिलती है। भागवत महापुराण कथा एक ऐसा मार्ग है जो प्रत्येक को मोक्ष की ओर ले जाती है। राजा परीक्षित को मिले श्राप से हुई मृत्यु के बाद भी कथा सुनने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसलिए कलयुग में मोक्ष की कामना करते है तो श्रीमद् भागवत महापुराण कथा से श्रेष्ठ मार्ग कोई नहीं है। उन्होंने कहा कि राजा परीक्षित को सात दिनों में सर्प के डसने से मृत्यु होने का श्राप मिला और उन्होंने इन सात दिनों में ही श्रीमद् भागवत कथा श्रवण कर मोक्ष को प्राप्त कर भगवान के बैकुंठ धाम को चले गए। इस कलयुग में भी मनुष्य श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण कर अपना कल्याण भी कर सकते हैं।

इस कलयुग मे भी मनुष्य भगवान के नाम स्मरण मात्र से भगवत् शरणागति की प्राप्त कर अपने जीवन को धन्य बना सकते है इसके बाद भागवत महापुराण की आरती भक्तों ने भक्तिभाव से ओत-प्रोत होकर की।

