“छेरछेरा माई कोठी के धान ल हेरहेरा…”
खुशियों से भर जाता है आंगन, जब छत्तीसगढ़ में मनाया जाता है छेरछेरा पर्व
– जय हो गौटिया जय हो तोर लबरा लफंगा नोहन चोर जय गंगा, आशीर्वाद के रूप मे दिए आशीष।
– सिरगिट्टी सहित ग्रामीण अंचलो मे रही धूम।
बिलासपुर- इन्हीं लोक पंक्तियों के साथ छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में छेरछेरा पर्व की शुरुआत हो जाती है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि दान, त्याग, कृषि संस्कृति और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक है।
छेरछेरा को छेरछेरा पुन्नी या छेरछेरा तिहार भी कहा जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से धान की कटाई और मिसाई के बाद मनाया जाता है, जब किसान अपनी मेहनत से उपजाए गए नए अन्न को अपने कोठारों में भर चुके होते हैं।
क्यों मनाया जाता है छेरछेरा पर्व?
छेरछेरा पर्व का मूल भाव दान है। मान्यता है कि अन्न का दान करने से महापुण्य की प्राप्ति होती है। किसान सालभर खेतों में कठिन परिश्रम करते हैं और जब फसल घर आती है, तो उसी अन्न का एक हिस्सा समाज के लिए दान कर वे ईश्वर और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
यह पर्व यह संदेश देता है कि समृद्धि तभी सार्थक है, जब वह सबके साथ साझा हो।
कैसे मनाया जाता है छेरछेरा-
इस दिन गांवों में बच्चे, महिलाएं, पुरुष और बुजुर्ग टोली बनाकर घर-घर जाते हैं।
हर घर के दरवाजे पर लोकगीत गूंजते हैं—
“छेरिक छेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान ला हेरहेरा…”
गृहस्वामी अपने कोठी (अन्न भंडार) से धान निकालकर खुशी-खुशी अन्नदान करते हैं। यह दृश्य गांवों में आपसी प्रेम, सहयोग और भाईचारे को और मजबूत करता है।
छेरछेरा पर्व का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
छेरछेरा छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और परंपराओं को सहेजने वाला पर्व है।
इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें— अमीर-गरीब का भेद मिटता है
सभी वर्ग एक साथ आते हैं
सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिलता है
पर्व के दौरान कई स्थानों पर लोक मेले, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नृत्य और गीत भी आयोजित होते हैं, जिससे स्थानीय कलाकारों और कारीगरों को रोजगार मिलता है।
प्रकृति और कृषि जीवन के प्रति आभार
छेरछेरा पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर भी है। किसान इस दिन धरती, जल, हवा और श्रम के योगदान को याद करते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि अन्न केवल भोजन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है।
(आज के दौर में भी प्रासंगिक)
आधुनिकता के बावजूद छेरछेरा पर्व आज भी गांवों में पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। यह पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का काम कर रहा है।
छेरछेरा सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा है-
जहां दान में अन्न, मन में अपनापन और गांव में खुशहाली बसती है।
छतीसगढ़ के ऐ पावन तिहार के आप सबो झन ल गाड़ा गाड़ा बधाई – नव संवाद (नवभारत)


