जिन परिवारो मे चलता है परम्परा वही उठाते है गौरा गौरी,तालाब मे डूबकर करते है विषर्जित।
– सिरगिट्टी के जय बुढ़ा देव नगर मे कई पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही परम्परा।
– लाल परिधान मे गौरा-गौरी गीत गाते है समुदाय के प्रमुख महिलाए।
सिरगिट्टी – (फोटो – गौरा-गौरी विशेष स्टोरी) छत्तीसगढ़ में गौरा गौरी उत्सव का एक अलग महत्व है प्रत्येक वर्ष दीपावली और लक्ष्मी पूजा के बाद मनाया जाता है। विशेष तौर पर भगवान शिव पार्वती की पूजा-अर्चना और उनके विवाह की रस्म निभाई जाती है भक्त बड़ी संख्या में धूमधाम से खुद बाराती बनकर माता पार्वती और शिव जी के विवाह उत्सव में शामिल होते हैं। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक त्यौहारों में से एक गौरा गौरी पूजा है सिरगिट्टी क्षेत्र मे त्योहार आदिवासी समुदाय द्वारा बीते सौ 136 वर्ष पहले से ही मनाते आ रहें है। आदिवासी समाज भले ही आज शहरीय क्षेत्र में रहते हों लेकिन ये आज भी अपनी पुरखो की परंपरा को निभाते आ रहे है बस इसी कारण निगम ने भी इस वार्ड को जय बूढा देव वार्ड के नाम से चिन्हाकित किया है।

छत्तीसगढ़ की पहचान गोड़ बैगा आदिवासी जनजातियों से होती है क्षेत्रीय सांस्कृतिक मानव जीवन की नैसर्गिक सुखों की यह एक जीती-जागती परम्परा है बिलासपुर से लगे सिरगिट्टी मे होने वाले पिछले 136 वर्षों से गौरा गौरी लोक संस्कृति का जीवंत उदाहरण है। सिरगिट्टी इलाके के बन्नाक चौक भीतरी पारा मे आदिवासी समाज द्वारा गुड़ी मे कई पीढ़ी से दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के साथ ही इशर गौरा गौरी पूजा न केवल करते आ रहें है। बल्कि गोवर्धन पूजा के दिन बड़े ही धूमधाम से गौरा गौरी की मूर्तियों को विषर्जन करने भव्य शोभायात्रा निकाला जाता है। क्षेत्र के आदिवासी समाज के बुजुर्ग व 90 वर्षीय बैसाखु कश्यप बताते है की इसकी शुरुवात कब हुई वे भी नहीं जानते परन्तु जब से सिरगिट्टी के निवासी हुए तब से आदिवासी गोड़ समाज के द्वारा इशर गौरा गौरी त्योहार मनाते देखते आ रहें है। बुजुर्गो ने बताया की सबसे पहले इशर गौरा गौरी की मिट्टी से मूर्ति विश्वकर्मा परिवार के द्वारा बनाया जाता है जिसके बाद गौरा के रूप मे भोलेनाथ व गौरी के रूप मे माता पार्वती की विधिवत पूजा अर्चना कर सभी मे खुशहाली बने रहें इस कामना को लिए विवाह कराया जाता है। जिस प्रकार घरो मे पुत्र-पुत्री का विवाह होता है सारी रश्मे निभाते हुए ठीक उसी तरह विवाह सम्पन्न कराई जाती है। बरात निकाला जाता है जिसमे भक्त भी भगवान के विवाह के साक्षी बनते है। आदिकाल से आते आ रहें इस परम्परा को पहले समाज असुविधा के बिच मनाते थे आज उसी परम्परा को बाखूबी निभाते हुए न केवल आदिवासी समाज बल्कि अन्य समाज के लोग भी बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाते आ रहे हैं। हर वर्ष की तरह आज भी पुराने परम्परा के अनुसार मांदर व मंजिरे के थाप पर हस्त निर्मित माता पार्वती व भोलेनाथ की मूर्ति का विषर्जन किया जाता है इस दौरान बूढ़ा देव की भी पूजा की जाती है इनका मानना है कि बूढ़ा देव भगवान महादेव के बेटे हैं जो सदैव अपनी कृपा इन पर बरसाते है।
( शरीर के उपर से ले जाने व सोटा खाने की परम्परा आज भी ) समाज के लोग गौरा गौरी पूजा की तैयारी कई दिन पहले से ही कर लेते है तीन दिन हस्त निर्मित मूर्ति की गोवर्धन पूजा के दिन भव्य शोभायात्रा निकली जाती है। इस दौरान जिस परिवार मे गौरा गौरी अपने सर पर उठाने का परम्परा है उनके द्वारा ही इन्हे अपने सर पर धारण किया जाता है। बरसो की मान्यता है की इस दिन पेट के बल लेटकर सभी मूर्तियों को अपने उपर से गुजारने से मनोकामनाएं पूरी होती है इस दिन लोग सोटा खाने के लिए भी लाइन लगकर खडे रहते है।
(भाई चारे की दिखती है झलक)
सिरगिट्टी से कई लोग अन्य जिले या गांव इलाके के रहवासी हो गए है यहां से जाने के बाद गौरा गौरी विषर्जन के दिन ही ऐसा होता है जब वे सब अपने जन्मभूमि पर पूरा परिवार आते है। आदिवासी के इस भव्य आयोजन मे न सिर्फ शामिल होते है बल्कि सभी बडो का आशीर्वाद भी लेते है। यह दिन बच्चों के लिए भी काफी खुशी का दिन होता है बच्चे इस दिन दीपावली से भी अधिक आतिशबाजी करते है।
(लाल परिधान,मांदर की थाप के साथ यदुवंशीयो को करते है आमंत्रित)
गौरा गौरी गीत गाते वक्त आदिवासी समुदाय के महिलाए लाल परिधान के साथ ही आदिवासी वेशभूषा मे रकते है जो गौरा गौरी गीत गाते है। गौरा गौरी विषर्जन के बाद आगे एकदशी की तैयारी हेतु यदुवंशीयों को रावत नाच हेतु आमंत्रित करते हुए मादर जो गौरा गौरी विषर्जन मे आदिवासी धुन मे बजाते थे। तालाब से लौटते वक़्त रावत नाच के ताल व दोहे के साथ बजाया जाता है जिसमे महिलाए,युवा युवतियाँ व बच्चे थिरकते हुए वापस गुड़ी तक जाते है।

