– सन 1982 से अब तक शिक्षा का जगा रहे अलख कई पाली मे दे रहे बच्चों को शिक्षा।
– आँखों की रोशनी नहीं पर सैकड़ो बच्चों की जीवन रोशन कर रहे।
– ब्रेललिपि में लिखे किताब को पढ़क वे बच्चों को मौखिक दे रहे शिक्षा।
कन्हैया कौशिक(बिलासपुर-सिरगिट्टी)
आँखे देख नहीं सकती परन्तु बुलंद हौशले नेक इरादे और जज्बा हो तो कोई कार्य भी मुश्किल नहीं होती जीवन में नियति ने तो जन्म से ही अन्धकार दिया लेकिन इन्होने उसे ही अपना ढाल बनाकर अपने हिम्मत को हमेशा के लिए प्रकाशवान कर दिया ए अपनी इस कमजोरी को कभी भी खुद पर हावी होने नहीं दिए ओ किसी का सहारा बनने के बजाय औरो के लिए प्रेरणा बन गए है इनका हौशला और जज्बा उन लोगो के लिए अनुकरणीय है जो अपने परेशानियों से जूझने के बजाय हार मान लेते है।

सिरगिट्टी वार्ड क्रमांक 10 आदर्श नगर निवासी मुरीतराम कश्यप दृष्टिहीन होने के बावजूद बच्चों को पढ़ाने व उन्हें एक निश्चित मुकाम तक ले जाने का जज्बा कम नहीं हुआ। दृष्टिहिन् शिक्षक ने कर दिखाया की अगर जितने की चाह हो तो लाख अर्चन आने के बाद भी जीत निश्चित ही होती है मुरितराम कश्यप शिक्षा की अलख जगाने आसपास के बच्चों को विगत 12 वर्षो से नि:शुल्क ट्यूशन दे रहे हैं मुरितराम दृष्टिहीन हैं उनकी दोनों आंखों की रोशनी चेचक की वजह से 6 साल की उम्र में ही चली गई थी उनका मानना है की आखिर मुझे भी समय बिताने के लिए कुछ तो करना होगा क्यों न गरीब और लाचार बच्चे पढ़ाई से वंचित न रह जाएं और वे अपने शहर,प्रदेश और देश का नाम रोशन कर सकें। मुरितराम कश्यप उम्र 65 वर्ष रेलवे के रिटायर कर्मचारी हैं सर्विस के दौरान ही उन्होंने शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने की मन में ठान लिया था यही कारण है कि जब भी मौका मिला वे शिक्षा का दान करने से हिचके नहीं। उन्होंने बताया कि 6 साल की उम्र में ही उन्हें चेचक हुआ था चेचक की वजह से ही उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई थी तब वे जांजगीर जिले के मलदा गांव में अपने माता-पिता के साथ रहते थे। पारिवारिक जिम्मेदारी के कारण वे दसवीं से आगे पढ़ नहीं पाए। मुरितराम में पढ़ाई करने की बचपन से ही ललक थी इस कारण वे बिलासपुर के जूनी लाइन स्थित शासकीय ब्रेल स्कूल में आकर पढ़ाई करने लगे वहीं हॉस्टल में रहते-रहते उन्होंने चेयर केनिन का काम भी सीख लिया था नौकरी की अब बच्चों को शिक्षा दे रहे है।
(बड़े-बड़े पदों पर काबिज हैं उनसे पढ़े बच्चे)
मुरितराम कश्यप ब्रेल लिपि के माध्यम से पढ़ते हैं और बच्चों को पढ़ाते भी हैं उनके पास पढ़ने वाले बच्चे सामान्य हैं वे दिव्यांग नहीं हैं। मुरितराम पहले बच्चों के स्कूल सब्जेक्ट की बुक ब्रेल लिपि में लेते हैं फिर उसका अध्ययन कर बच्चों को पढ़ाते हैं उनका कहना है कि वह कम पढ़े हैं, लेकिन उनके पढ़ाए बच्चे आज बड़े-बड़े पोस्ट पर सर्विस कर रहे हैं। मुरितराम ने बताया कि वो पिछले सन 1982 से इसी तरह गरीब बच्चों को पढ़ा रहे हैं उनकी पाली सुबह 7.30 से शुरू हो जाती है जो देर रात चलते रहता है उनके पास इन दिनों प्रत्येक पाली मे कम से कम 10 बच्चे हैं।
(पत्नी ने कहा-सुखमय बीत रहा हम सभी का जीवन)
शिक्षक की पत्नी मीना कश्यप ने बताया कि जब उनकी शादी हुई थी तो दोनों पति-पत्नी के अलावा उनके साथ कोई नहीं रहता था तब पति के ड्यूटी आने जाने पर उनके बारे में चिंता होती थी। फिर बाद में उन्हें समझ आया कि उनके पति को सहारे की जरूरत नहीं है। वे खुद अपना सारा काम कर लेते हैं मीना ने बताया कि हमें कोई दिक्कत नहीं है और जीवन सुखमय बीत रहा है।

(कई सक्षम पिता भी नहीं कर पाते ओ मेरे पिता ने किया)
मुरितराम कश्यप के चार बच्चे हैं दो लड़के और दो लड़की है सभी की शादी हो चुकी है उनके बेटे विकास ने बताया कि उन्हें गर्व होता है कि उनके पापा ने दिव्यांग होकर भी इतने अच्छे से हम सभी की परवरिश की है। उसे अपने दोस्तों को घर लाकर अपने पिता से मिलवाने पर गर्व महसूस होता है क्योंकि अधिकांश पिता शारीरिक रूप से सक्षम होते हुए भी अपने बच्चों की परवरिश अच्छे से नहीं कर पाते पर उनके पिता ने दिव्यांग होते हुए भी अपना फर्ज निभाया है ।

(बच्चे बोले इनका पढ़ाने का तरीका ही अलग है दिमाग़ मे आसानी से बैठ जाता है ) इनसे शिक्षा ग्रहण करने पहुंचने वाले बच्चों ने बताया की इस क्षेत्र मे कई टीचर अपने घरो मे पढ़ाते है हमने कई जगह पड़ना चाहा परन्तु कईओ के पढ़ाने का तरीका व इनके पढ़ाने का तरीका मे बहुत फर्क है। हमें अपने बच्चों की तरह रखते है पढ़ाते है हमें जब तक अच्छे से पढ़ा न ले वे आगे बढ़ते ही नहीं हालांकि जो पढ़ाते है दिमाग़ मे आसानी से बैठ जाता है नयन बंजारा,सुषमा यादव ने कहा की यहां जितने अच्छे से समझ आता है कहीं और ऐसी पढ़ाई नहीं होती।

