– समय के साथ हुआ बदलाव परन्तु आज भी समाज ने अपनी मूल संस्कृति को रखा बरकरार।
– साल-दर-साल इस उत्सव को लेकर यदुवंशियों का उत्साह बढ़ता गया और आज यह देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी आभा बिखेर रहे है।
– यादव समाज बसिया अब तक कई राज्य व जिले के उत्सव मे आ चुके प्रथम बीते वर्ष बिलासपुर का बढ़ाया मान।
– ग्राम के मुख्य गेट मे श्री कृष्णा की बनी मूर्ति व कई कृष्णा राधा के मंदिर।
– सिरगिट्टी मे आज रावत नाच महोत्सव शिरकत करेंगे उपमुख्यमंत्री अरुण साव, विधायक धरम लाल कौशिक,विधायक रामकुमार यादव।
बिलासपुर – यादव समाज का इतिहास बहुत ही गौरवशाली रहा है समाज के लोग गौरवशाली प्राचीन परंपरा को आज भी संजोए हुए हैं। छत्तीसगढ़ में यादव समाज का पारंपरिक राउत नाच दीपावली के बाद देवउठनी एकादशी मे शुरू होता है सामूहिक रूप मे नर्तक घर-घर जाकर नृत्य और संगीत के रूप में विविध महाभारत कालीन युद्ध की कहानियों को एक अनोखे ढंग से चित्रित करते है बेटी बचाव बेटी पढ़ाव,नशे से दूर रहना व समाज मे बेटियों का योगदान हेतु जागरूकता के गीत गाकर दान लेते हैं और गृहस्वामियों की समृद्धि की कामना करते हैं इनके दोहे भक्ति,नीति,हास्य या फिर पौराणिक संदर्भों से जुड़े होते हैं। नर्तक रंग-बिरंगे कपड़े,कौड़ियां जड़ी जैकेट और चमकदार रंगीन टोपी पहनते हुए होते है हाथ में सजी हुई लाठी व स्त्री वेश में कुछ पुरुष भी स्वांग रचते दिखाई पड़ते है।

बिलासपुर से जुड़े ग्राम पंचायत बसिया है जहाँ यादव समाज सबसे अधिक है यहां 90 प्रतिशत यादव समाज के लोग न केवल निवासरत है बल्कि इनके द्वारा प्राचीन काल से आ रही मूल संस्कृति को बाखूबी निभाते आ रहें है। गांव के मुख्य द्वार पर बने गेट व भगवान कृष्ण की मूर्ति सहित कृष्णा भगवान के कई मंदिर इस गांव की शोभा को चार चाँद लगा रही है। समाज प्रमुखो के द्वारा समाज को एक नया आयाम या दिशा मिले इस उद्देश्य को लिए हुए रावत नाच करते आ रहें है इनके द्वारा बीते कई वर्षो से रावत नाच किया जा रहा है। सर्व प्रथम इसकी शुरुवात गांव के ही स्व.फेकूराम यादव ने समाज प्रमुख होने के नाते किया था आज उस समाज व रावत नाच समिति के अध्यक्ष कन्हैया यादव है। देवउठनी एकादशी के दिन से शुरू होने वाले इस पारंपरिक नृत्य की छटा क्षेत्र मे देखने मिल जाती है यह नृत्य शौर्य एवं श्रृंगार का नृत्य है जिसमे पैरो की थिरकन व लय का विशेष महत्व है। ग्राम पंचायत बसिया मे यह परम्परा कब से शुरू हुई गांव के बुजुर्ग भी नहीं बता पा रहें है इनका बस यही कहना है की यह परम्परा आदि काल से चलता आ रहा है। छोटे थे तबसे गड़वा बाजा मे थिरकने की चाह थी गांव मे जब इसकी शुरुवात होती महज बाजे की आवाज सुन वहा पहुंच जाते थे बताते चले की पहले बैल गाडी मे बैठकर इनके द्वारा शनिचरी व कई मड़ाई मेले मे पहुंचते थे समय के साथ अब बड़ी गाड़ियों मे निकलते है। लोक लाज़ के चलते जिस नृत्य को कुछ लोग ही करते थे आज समाज के सभी लोग इससे जुड़ चुके और उत्साह के साथ अपने समाज की इस मूल संस्कृति को निभाते आ रहें है। जैसे जैसे रावत महोत्सव करीब आता है सभी एकजुटता का परिचय देते है ग्राम से निकलने वाले इस सामूहिक राउत-नृत्य में प्रमुख रूप से पुरुष सम्मिलित होते हैं तथा उत्सुकतावश बालक भी इनका अनुसरण करते हुए महोत्सवो मे अपना प्रदर्शन दिखाते हैं।

(घर की महिलाए पुरुष वर्ग को सजा कर करती है विदा)
रावत नाच जिसमे पुरुष वर्ग शामिल होकर अपने
नृत्य,शौर्य एवं श्रृंगार का प्रदर्शन करते है परन्तु घरो से निकलते वक़्त सभी एक साथ कृष्णा मंदिर पहुंचते है। जहाँ श्री कृष्णा की विधिवत आरती उतारी जाती है गांव की महिलाए इनकी भी पूजा कर गांव की गरिमा व बुजुर्गो की परम्परा को बनाते हुए प्रथम आने की कामना करते है। इससे पहले महिलाएं ही अपने घरो के पुरुष व बच्चों को सजा कर बिदा करते है इस दौरान यदुवंशी बड़े बुजुर्गो से आशीर्वाद लेकर उत्सव मे शामिल होने निकल पड़ते है।

(रावत नाच महोत्सव मे 1978 से कर रहें प्रदर्शन)
राउत नाचा छत्तीसगढ़ के सबसे प्रसिद्ध लोक नृत्यों में से एक है 1978 से अविभाजित मध्य प्रदेश के पूर्व मंत्री बी.आर.यादव के नेतृत्व में बिलासपुर मे रावत नाच महोत्सव की शुरुवात की गई थी। जिसमे ग्राम बसिया,सिरगिट्टी, तारबाहर के यादव समाज को अपने शौर्य का प्रदर्शन करने आमंत्रित किया गया था। तब से प्रतिवर्ष होने वाले रावत नाच महोत्सव मे यहां के यदुवंशी अपना नृत्य का प्रदर्शन न केवल राज्य स्तरीय रावत नाच महोत्सव मे करते आ रहे बल्कि ए ग्रामीण इलाको मे होने वाले मडई मेले मे भी शामिल होकर अपना कर्तब दिखा रहें है।

(एक माह पूर्व रात दिन एक कर जुट जाते है तैयारी में)
बसिया के यदुवंशी देवी-देवताओं की वंदना के साथ सांस्कृतिक प्रदर्शन की तैयारी में दीपावली के एक माह पहले ही जुट जाते है ग्राम के स्कूल के सामने इनकी तैयारी पूरी होती है। इस दौरान ए नृत्य के साथ दोहो में आदिवासी जीवन शैली का वर्णन करना,जनजातीय दर्शन और उनके आदर्श संगीत व कवि कबीर और तुलसी की छंद छत्तीसगढ़ के प्रागैतिहासिक आदिवासी समुदायों के मध्य में प्राचीन काल के स्मृति का ज्ञान सहित भगवान कृष्णा व गोपी के नित्य के जैसा ही तैयारी करते हैं इसमें बच्चे भी सामिल होते है।


